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Kanya Pooja And Kanya Bhoj : Why Do Kanya Pooja And Kanya Bhoj In Navaratri Know Importence | नवरात्रि में कन्या पूजन में रखें इन बातों का ध्यान, जानें महत्व और मान्यता – Vrat Tyohar


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बिना कन्या पूजन के नवरात्रि की पूजा पूरी नहीं मानी जाती है। कन्याओं को नौ देवी का रूप मानकर अष्टमी या नवमी के दिन उनका आदर सत्कार करके भोज कराया जाता है और उसके बाद पूजा की जाती है। हिंदू धर्म में कुंवारी कन्याओं को मां दुर्गा के समान पवित्र और पूजनीय माना गया है। दो वर्ष से लेकर 10 वर्ष तक की कन्याएं साक्षात माता का स्वरूप मानी जाती हैं।

नौ कन्याओं के साथ इनको भी बुलाएं
वैसे तो अष्टमी के दिन भी कई लोग कन्या पूजन करते है लेकिन जो नवरात्रि के नौ दिन उपवास रखते हैं, वह नवमी के दिन कन्या पूजने के बाद ही प्रसाद ग्रहण करते हैं। कन्या पूजन में नौ कन्याओं को बुलाया जाता है और एक बालक को भी शामिल किया जाता है। इस बालक को हनुमानजी का रूप माना जाता है। इसका एक नाम कंजक भी है। माना जाता है कि यदि कन्या पूजा विधि-विधान से नहीं किया गया हो तो माता नाराज हो जाती हैं।

कब है अष्टमी और नवमी?
कुछ लोग अष्टमी के दिन भी कन्या पूजा करते हैं। इस बार दुर्गा पूजा की अष्टमी 17 अक्टूबर, दिन बुधवार को है। वहीं नवमी 18 अक्टूबर को है। इस दिन हवन भी किया जाता है। माना जाता है माता जितनी खुश हवन और जप करने से होती हैं, उतनी खुश वह कन्या पूजन से होती हैं।

इस तरह करें कन्या पूजन
शास्त्रों में बताया गया है कि कन्या पूजन से ऐश्वर्य, सुख-शांति, विद्या और मोक्ष की प्राप्ति होती है। कन्या पुजा के एक दिन पहले सभी कन्याओं को घर आने का आमंत्रित दिया जाता है। जब सभी कन्याएं घर आएं तब सच्चे मन से माता रानी के जयकारी लगाने चाहिए क्योंकि उस ऐसा मानें, जैसे मां के 9 स्वरूप खुद चलकर आपके घर आ रहे हों।

सभी कन्याओं को स्वच्छ स्थान पर बैठाएं और सभी के पैर साफ करें। इसके बाद माता रानी को भोग लगाया हुआ भोजन कन्याओं को दें। मां भगवती को हलुआ और चना बहुत पसंद हैं इसलिए इन दोनो को खाने में जरूर रखें। भोजन के बाद सभी कन्याओं के माथे पर कुमकुम से तिलक लगाएं और अपनी इच्छानुसार दक्षिणा दें। इसके बाद उनको विदा करें फिर प्रसाद ग्रहण करें।

कन्या पूजन की प्राचीन परंपरा
मान्यता है कि माता के भक्त पंडित श्रीधर के कोई संतान नहीं थी। एक दिन उसने नवरात्र पूजन में कुंवारी कन्याओं को बुलाया। इस बीच मां बैष्णो कन्याओं के बीच आकर बैठ गईं। सभी कन्याएं भोज करके और दक्षिण पाकर चली गईं लेकिन मां रह गईं। उन्होंने श्रीधर से कहा कि तुम अपने यहां मंडार रखो और पूरे गांव को आमंत्रित करो। भंडारे के बाद श्रीधर के घर एक कन्या ने जन्म लिया तब से कन्या पूजन का पुण्य सभी ले रहे हैं।




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